उस राह की परछाइयाँ

सेप्टेम्बर 4, 2026 · कविताहरू · 2 मिनेट पढाइको समय

जिस रास्ते से तुम गई थीं,
उसी राह से लौटने वाली हर लड़की
मुझे तुम-सी लगती है।

उसी रास्ते से मदन के संग मुना लौटी,
वहीं से लैला भी गुज़री,
रोमियो के साथ जूलियट भी लौटी,
और पारु आई, देवदास की बोतल छीनती हुई।

गर उस सारे हुजूम में
तुम्हारा चेहरा कहीं नज़र न आया।

हर रोज़
मैं फिर आँखें बंद कर लेता हूँ
और उसी दोराहे पर बैठ जाता हूँ,
वही गीत सुनता हुआ

“रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।”